राजस्थान और गुजरात के जिन किसानों ने 2019–20 के रेगिस्तानी टिड्डी-दलों को झेला, वे एक-सी बातें बताते हैं: दिखने से पहले सुनाई देने वाला शोर, आसमान का भूरा पड़ जाना, शाम तक हरे-भरे खेत का साफ़ हो जाना, और एक बादल के सामने थालियाँ पीटने की बेबसी। टिड्डियों की विपत्ति कोई तूफ़ान नहीं जो गुज़र जाए; वह एक सेना है जो खा जाती है। यूहन्ना के पहले श्रोता यह भय योएल और निर्गमन से जानते थे। प्रकाशितवाक्य 9 में वे उस पुराने दुःस्वप्न को लेकर उसे और भी विचित्र बना देते हैं — मनुष्यों जैसे चेहरे, सिंहों जैसे दाँत और बिच्छुओं जैसे डंक वाली टिड्डियाँ, जिनका अगुवा एक ऐसा राजा है जिसके नाम का अर्थ है विनाश।
कहानी में यह कहाँ है: छठा अंक — नई सृष्टि — आ रहा है, पर प्रकाशितवाक्य उसे परमेश्वर का विरोध करने वाले संसार पर न्याय के बीच से आते हुए दिखाता है। अध्याय 8–9 की तुरहियाँ मिस्र पर आई विपत्तियों की गूँज हैं: जैसे परमेश्वर ने एक बार अपने लोगों को छुड़ाने के लिए फ़िरौन की पकड़ तोड़ी थी, वैसे ही ये चेतावनियाँ संसार की शक्तियों को हिला देती हैं। अध्याय 9 पाँचवीं और छठी तुरही लाता है, जो घोषित तीन 'हाय' में से पहली दो हैं, और इस गंभीर बात पर समाप्त होता है कि इन चेतावनियों से पश्चाताप नहीं हुआ।
यह अध्याय क्या कर रहा है: न्याय को अंधे क्रोध के रूप में नहीं, बल्कि सीमित चेतावनी के रूप में दिखाना — टिड्डियाँ पीड़ा दे सकती हैं पर मार नहीं सकतीं, और परमेश्वर की मुहर पाए हुओं को छू भी नहीं सकतीं — और यह उजागर करना कि मनुष्य का हृदय मार पड़ने पर भी अपनी मूर्तियों को कितनी गहराई से पकड़े रह सकता है।
- 9:1–6 — पाँचवीं तुरही पर एक गिरे हुए तारे को अथाह कुंड की कुंजी दी जाती है। धुआँ उमड़ता है और उसके साथ टिड्डियाँ निकलती हैं, जिन्हें आज्ञा है कि घास को छोड़ दें और केवल उन्हीं को हानि पहुँचाएँ जिन पर परमेश्वर की मुहर नहीं है, और वह भी केवल पाँच महीने तक। पीड़ा इतनी बड़ी है कि लोग मृत्यु चाहते हैं पर उसे पाते नहीं।
- 9:7–12 — यूहन्ना इस दल का वर्णन युद्ध के घोड़ों की सेना की तरह करते हैं: मुकुट, मनुष्यों जैसे चेहरे, स्त्रियों जैसे बाल, लोहे की झिलमें, रथों की तरह गरजते पंख। उनका राजा अथाह कुंड का दूत है, जिसे इब्रानी में अबद्दोन और यूनानी में अपुल्लयोन कहा गया है — दोनों का अर्थ है नाश करने वाला। पहली हाय बीत चुकी।
- 9:13–19 — छठी तुरही पर सोने की वेदी से एक आवाज़ फरात के पास बँधे चार स्वर्गदूतों को खोल देती है, जो एक ठीक घड़ी के लिए तैयार रखे गए थे। बीस करोड़ की घुड़सवार सेना निकल पड़ती है; घोड़ों के सिर सिंहों जैसे हैं जो आग, धुआँ और गंधक उगलते हैं, और एक तिहाई मनुष्य मारे जाते हैं।
- 9:20–21 — बचे हुए लोग दुष्टात्माओं की और सोने, चाँदी, पत्थर और लकड़ी की निर्जीव मूर्तियों की उपासना से नहीं फिरते, और न ही अपनी हत्याओं, जादू-टोने, व्यभिचार और चोरियों से। अध्याय एक उजड़े संसार पर नहीं, बल्कि इस इनकार पर समाप्त होता है।
मुख्य पद: प्रकाशितवाक्य 9:20 · तो क्या: यहाँ की विचलित करने वाली ईमानदारी दैत्यों में नहीं, बल्कि अंतिम दो पदों में है। दुःख अपने-आप लोगों को नरम नहीं कर देता; वह उन्हें कठोर भी कर सकता है। प्रकाशितवाक्य इस विचार को नकारता है कि पर्याप्त पीड़ा किसी को परमेश्वर से प्रेम करने के लिए विवश कर देगी। साथ ही वह इस भयावहता की सीमा भी तय करता है: मुहर पाए हुए सुरक्षित हैं और पीड़ा की एक अवधि है। वास्तविक आपदाओं का सामना करने वाले पाठक दोनों बातों को गंभीरता से ले सकते हैं — बुराई की वास्तविकता, और वह सीमा जो परमेश्वर उस पर बाँधता है।