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957 / 1113 · याकूब 3 · कलीसिया और पत्र · लगभग 45–49 ईस्वी (आरंभिक तिथि का मत)

जीभ और ऊपर से आने वाला ज्ञान

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आगे भेजा गया एक ही संदेश नाश्ते से पहले पूरा राज्य पार कर सकता है। बहुत से भारतीय परिवारों ने सीखा है कि फ़ोन पर फैली एक अफ़वाह क्या कर सकती है — एक प्रतिष्ठा मिट्टी में, एक सगाई टूटी, कभी-कभी किसी दरवाज़े पर इकट्ठी हुई गुस्साई भीड़। याकूब के पास फ़ोन नहीं थे, पर वे इस ढर्रे को ठीक-ठीक जानते थे। वे लिखते हैं कि एक छोटी सी चिंगारी पूरे जंगल को जला सकती है। इस अध्याय में शरीर का सबसे छोटा अंग सबसे ख़तरनाक अंगों में से एक निकलता है — और उनका उपाय चुप्पी नहीं, बल्कि एक अलग प्रकार का ज्ञान है, जो प्रतिद्वंद्विता से नहीं, नम्रता से आरंभ होता है।

कहानी में यह कहाँ है: पाँचवाँ अंक — कलीसिया। आरंभिक मंडलियों में शिक्षक बनने के इच्छुक भी बहुत थे और बहसें भी बहुत। याकूब, इस्राएल की बुद्धि-परंपरा में खड़े होकर — नीतिवचन जीभ के विषय में चेतावनियों से भरा है — उसे नए समुदाय पर लागू करते हैं: विश्वासी एक-दूसरे से और एक-दूसरे के बारे में जो कहते हैं, वह या तो कलीसिया को बनाता है या उसे जला डालता है।

यह अध्याय क्या कर रहा है: यह दिखाना कि वाणी वह जगह है जहाँ विश्वास की सबसे अधिक परीक्षा होती है, और कि विनाशकारी बातों का उत्तर वह नम्र, मेल कराने वाला ज्ञान है जो परमेश्वर से आता है।

इसे यहाँ क्यों पढ़ा जाता है: याकूब को जल्दी, प्रेरितों के काम 15 की सभा से पहले पढ़ा जाता है, क्योंकि यह अन्यजातियों का प्रश्न कभी नहीं उठाता और पहली यहूदी-मसीही पीढ़ी जैसा लगता है। अन्य लोग इसे 60 के दशक का मानते हैं, या उससे भी बाद का, यदि यह यीशु के भाई द्वारा नहीं लिखा गया।
पद-दर-पद
  • 3:1–5 — बहुत से लोग शिक्षक न बनें, क्योंकि शिक्षकों का न्याय अधिक कड़ाई से होगा। हम सब चूकते हैं, विशेषकर वाणी में। एक छोटी सी लगाम घोड़े को मोड़ देती है और एक छोटी सी पतवार बड़े जहाज़ को घुमा देती है; जीभ भी छोटी है, पर बड़ी-बड़ी डींगें मारती है।
  • 3:6–12 — जीभ एक आग है जो जीवन की पूरी गति को भड़का सकती है। मनुष्यों ने हर प्रकार के पशु को वश में कर लिया है, पर जीभ को कोई वश में नहीं कर सकता। उसी से हम परमेश्वर को धन्य कहते हैं और उसके स्वरूप में बने मनुष्यों को शाप देते हैं — उतना ही अस्वाभाविक जितना एक ही सोते से मीठा और खारा पानी निकलना, या अंजीर के पेड़ पर जैतून लगना।
  • 3:13–18 — बुद्धिमान कौन है? वह नम्रता से किए गए अच्छे चाल-चलन से इसे दिखाए। कड़वी ईर्ष्या और स्वार्थी महत्वाकांक्षा सांसारिक ज्ञान है और अव्यवस्था की ओर ले जाती है। ऊपर से आने वाला ज्ञान पवित्र, मिलनसार, कोमल, झुकने को तैयार और दया से भरा होता है — और मेल कराने वाले धार्मिकता की फ़सल बोते हैं।
यह क्या दिखाता हैअध्याय के चित्र — घोड़ों की लगाम, जहाज़ों की पतवार, जंगल की आग, सोते, अंजीर और जैतून — पूर्वी भूमध्यसागर के रोज़मर्रा के संसार के हैं, और इसके विषय नीतिवचन और सिराक जैसे यहूदी बुद्धि-साहित्य से गहरा मेल खाते हैं।
साक्ष्य कहाँ रुकता हैयाकूब यह नहीं बताते कि परेशानी खड़ी करने वाले शिक्षक कौन थे या वे क्या सिखाते थे; अध्याय के पीछे किसी विशेष विवाद को पहचानने के प्रयास अनुमान ही हैं।

मुख्य पद: याकूब 3:17  ·  तो क्या: लोग एक-दूसरे को जो हानि पहुँचाते हैं, उसका अधिकांश भाग शब्दों से होता है — चुगली, व्यंग्य, वह वाक्य जो वापस नहीं लिया जा सकता। याकूब चुप्पी नहीं माँगते; वे पूछते हैं कि हमारे शब्द कहाँ से आते हैं। ईर्ष्या और प्रतिद्वंद्विता एक प्रकार की वाणी उत्पन्न करती हैं, नम्रता और दया दूसरी। यह एक ऐसी कसौटी है जिसे कोई भी 'भेजें' दबाने से पहले लागू कर सकता है।

← काम करने वाला विश्वासआपने अभी पक्षपात और काम करने वाले विश्वास के विषय में याकूब को पढ़ा (याकूब 2)। आगे, वे कलीसिया के झगड़ों की जड़ अभिलाषा और घमंड में खोजते हैं, और परमेश्वर के बिना योजना बनाने वाले व्यापारियों को चेतावनी देते हैं (याकूब 4)।झगड़े, घमंड और 'यदि प्रभु चाहे' →
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