मसौदा अनुवाद. मातृभाषी ईसाइयों के सुधार स्वागत हैं। पद-पाठ KJV (अंग्रेज़ी) में रहता है।
भजन संहिता 1 — दो मार्ग
भजन संहिता का प्रवेश-द्वार। छः पद पूरी पुस्तक को — और पूरे जीवन को — दो मार्गों के रूप में सामने रखते हैं। एक का अन्त फलवन्त होने में होता है, दूसरे का भूसी में। चुनाव साफ़-साफ़ सामने रखा गया है, और बाकी सारे भजन इस बात के परिणामों से गूँजते हैं कि कौन-सा मार्ग चुना गया।
“क्या ही धन्य है वह मनुष्य जो दुष्टों की योजना पर नहीं चलता, और न पापियों के मार्ग में खड़ा होता; और न ठट्ठा करनेवालों की मण्डली में बैठता है! परन्तु वह तो यहोवा की व्यवस्था से प्रसन्न रहता; और उसकी व्यवस्था पर रात-दिन ध्यान करता रहता है।”
— भजन संहिता 1:1-2
- v.1-3 धर्मी का मार्ग — वर्णित, जड़ पकड़े हुए, फलवन्त
- v.4-5 दुष्ट का मार्ग — भूसी के समान, बिखरा हुआ, न्याय के अधीन
- v.6 दोनों मार्गों का सार
सकारात्मक विरोधाभास। धन्य मनुष्य केवल गलत काम नहीं करता, इतना ही नहीं — वह सही बात से प्रसन्न रहता है। केवल बचे रहना पर्याप्त नहीं है। उसमें प्रेम भी होना चाहिए।
“प्रसन्न रहता” — कर्तव्य नहीं। बहुत से लोग डर के कारण व्यवस्था का पालन करते हैं। धन्य मनुष्य प्रेम के कारण उसका पालन करता है।
यहाँ ध्यान करने का अर्थ मन को खाली करना नहीं, बल्कि उसे एक ही बात से भर देना है। रात-दिन, वचन उसके विचारों का निरन्तर बजता संगीत है।
एक वृक्ष — हवा में लुढ़कती सूखी झाड़ी नहीं। जड़ पकड़े हुए। स्थिर। एक निरन्तर स्रोत से जीवन खींचता हुआ।
“लगाया गया” — अपने आप जंगली नहीं उगा। धन्य मनुष्य का स्थान कोई संयोग नहीं है। माली ने उसे वहाँ लगाया है।
“अपनी ऋतु में फलता है” — इसमें धीरज निहित है। वृक्ष हर ऋतु में फल नहीं देता। कुछ ऋतुओं में वह सुप्त रहता है। प्रतिज्ञा उचित समय पर फल की है, निरन्तर फल की नहीं।
“पत्ते कभी मुरझाते नहीं” — फल न देनेवाली ऋतुओं में भी जीवन चलता रहता है। विश्वासी कभी आत्मिक जीवन-शक्ति से रहित नहीं होता, तब भी नहीं जब वह फल नहीं ला रहा होता।
विरोधाभास पूर्ण है। एक लगाया हुआ वृक्ष बनाम उड़ती हुई भूसी। ठोसपन बनाम खोखलापन। जड़ पकड़े हुए बनाम जड़हीन।
भूसी में कोई भार नहीं होता। खलिहान में वह महत्वपूर्ण दिखती है — जब तक हवा नहीं चलती। तब जो कुछ मूल्यवान है वह नीचे गिर जाता है, और केवल हल्की वस्तु उड़ा ली जाती है।
न्याय का दिन प्रगट करेगा कि क्या गेहूँ है और क्या भूसी। कोई तीसरी श्रेणी नहीं है।
अन्तिम न्याय में दुष्ट स्थिर नहीं रह सकते। उनके पाँवों के नीचे ऐसी कोई नींव नहीं जो परमेश्वर की पवित्रता का भार सह सके।
वे धर्मियों की मण्डली से भी बाहर रखे जाएँगे। स्वर्ग ऐसा स्थान नहीं है जहाँ हर कोई बस पहुँच जाए; वह उनके लिये है जिनके हृदय पहले ही उसके नागरिक बनाए जा चुके हैं (फिलिप्पियों 3:20)।
“जानता है” — केवल बौद्धिक रूप से अवगत होना नहीं, बल्कि घनिष्ठ रूप से परिचित होना, ध्यान देना, देखभाल करना। यह वही इब्रानी शब्द है जो विवाह की घनिष्ठता के लिये प्रयुक्त होता है।
दुष्टों का मार्ग नाश हो जाएगा। वह पहले से ही शून्य की ओर जानेवाले रास्ते पर है। उसे असफल होने के लिये किसी अन्तिम विपत्ति की आवश्यकता नहीं; असफलता उसके स्वभाव में ही बनी हुई है।
जाँचिए कि आप कहाँ चलते, कहाँ खड़े होते और कहाँ बैठते हैं। आप किसकी सम्मति सुन रहे हैं? किन मार्गों में आप जमते जा रहे हैं? किन आसनों पर आप सहज होते जा रहे हैं? संसार की आवाज़ों के भोजन के स्थान पर उनके वचन से प्रसन्न रहिए, और रात-दिन उस पर ध्यान कीजिए।
मसीह भजन 1 के एकमात्र पूर्ण रूप से धन्य मनुष्य हैं — एकमात्र वही जो कभी दुष्टों की योजना पर नहीं चले। वही जल की धाराओं के किनारे लगाया गया वृक्ष हैं, जिन्होंने वह एकमात्र फल दिया जो पिता को ग्रहणयोग्य था। विश्वास के द्वारा हम उनमें साटे जाते हैं और उनके लगाए हुए वृक्ष बन जाते हैं।
इस पृष्ठ पर आपकी भाषा में पवित्रशास्त्र का पाठ: इंडियन रिवाइज़्ड वर्ज़न (IRV), © 2017, 2019 ब्रिज कनेक्टिविटी सॉल्यूशंस — बिना बदलाव के इस लाइसेंस के अंतर्गत प्रयुक्त: CC BY-SA 4.0 · eBible.org

नीचे की ओर जाती मुद्रा पर ध्यान दीजिए: चलना, खड़ा होना, बैठना। पाप की प्रगति सदा नीचे की ओर होती है — पहले आप उसके पास से होकर चलते हैं, फिर उसमें ठहर कर खड़े हो जाते हैं, फिर उसमें जमकर बैठ जाते हैं।
गहराती हुई संलिप्तता पर भी ध्यान दीजिए: योजना (सुनना), मार्ग (साथ जुड़ना), बैठने का स्थान (वैसा ही बन जाना)। जो जिज्ञासा से आरम्भ होता है, उसका अन्त उसी के साथ एकरूप हो जाने में होता है।
“धन्य” — इब्रानी अश्रे, जिसका रूप बहुवचन है। “ओह, उस मनुष्य की प्रसन्नताएँ!” यह कोई कठोर, भावशून्य नैतिकता नहीं है; यह सही क्रम में सजे हुए जीवन का कई गुना बढ़ा हुआ आनन्द है।