बंबई में शिक्षित एक दक्कनी ब्राह्मण नारायण शेषाद्रि ने 1843 में बपतिस्मा लिया और अपना जीवन मराठी लोगों के बीच प्रचार करने तथा बहिष्कृत एवं अकाल-पीड़ित परिवारों को बचाने में लगा दिया। उनके लंबे परिश्रम ने उन्हें स्नेहपूर्ण उपाधि “मराठों का प्रेरित” दिलाई।
उनके जीवन के उन्नीसवीं सदी के संस्मरण — सार्वजनिक अधिकार-क्षेत्र में।
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