एक संस्कृत विदुषी और उच्च-जाति की विधवा, अपनी विद्वत्ता के लिए पूरे भारत में सम्मानित, रमाबाई ने 1883 में बपतिस्मा लिया और विधवाओं तथा अकाल के अनाथों को शरण देने के लिए पुणे के निकट मुक्ति मिशन की स्थापना की। 1905 में वहाँ एक उल्लेखनीय प्रार्थना-पुनरुत्थान फूट पड़ा। उन्होंने उस लंबे रास्ते का अपना वृत्तांत उतारा जो उन्हें मसीह तक लाया।
‘भारत में मिशन’ में उनका पृष्ठ →पंडिता रमाबाई, अ टेस्टिमनी (उनके अपने शब्द) और हेलेन डायर की 1900 की जीवनी — सार्वजनिक अधिकार-क्षेत्र में।
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